ईरान की जनता के ख़िलाफ़ अधिकतम दबाव की नीति भी इससे अलग नहीं है। अमरीका ने ईरान के ख़िलाफ़ तीन तरह की साज़िशें तैयार की थींः
- ईरान को शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के लाभों से वंचित करने और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर ईरान को अलग-थलग करने के लिए परमाणु समझौते को तबाह करना।
- सैन्य धमकियों व दबावों के मुक़ाबले में ईरानी राष्ट्र की शक्ति व प्रतिरक्षा को कमज़ोर बनाना। अमरीका ने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ईरान की मीज़ाइल क्षमता को ख़तरा बना कर पेश करने की कोशिश की।
- ईरान पर अधिकतम दबाव डालने के लिए आर्थिक प्रतिबंधों में ज़्यादा से ज़्यादा वृद्धि। इस साज़िश को लागू करने के लिए अमरीका ने दवाओं तक ईरान की पहुंच को सीमित करने तक को एक हथकंडे के रूप में इस्तेमाल किया। ट्रम्प सरकार को आशा थी कि ईरान की जनता प्रतिबंधों से तंग आ कर इस्लामी व्यवस्था के ख़िलाफ़ उठ खड़ी होगी और या तो यह व्यवस्था ही बदल जाएगी या फिर ईरान, अमरीका के सामने झुक जाएगा।
इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद से ही अमरीका ने ईरान के ख़िलाफ़ हर संभव काम किया जिसमें प्रतिबंध, ईरान के ख़िलाफ़ थोपे गए युद्ध में सद्दाम का समर्थन, विद्रोह की साज़िश, आतंकी गुटों की मदद और ईरान को नुक़सान पहुंचाने के लिए उसके क्षेत्रीय दुश्मनों का इस्तेमाल जैसे काम शामिल हैं लेकिन उसे किसी भी तरह की सफलता हासिल नहीं हुई। ईरान के विदेश मंत्री मुहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने तेहरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंध जारी रखने और उनमें वृद्धि करने की अमरीका की घोषणा की प्रतिक्रिया में ट्वीट किया हैः "अमरीका सभी महिलाओं, पुरुषों व बच्चों को प्रतिबंधित कर सकता है लेकिन ईरानी, ग़ुंडागर्दी के सामने सिर नहीं झुकाएंगे। अमरीका को चाहिए कि जिस कुएं में वह गिरा हुआ है, उसे और गहरा करने के बजाए, अपनी विफल नीतियों को छोड़ कर परमाणु समझौते में वापस आ जाए।"
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भी एक इंटरव्यू में अमरीका की नीतियों के भविष्य की समीक्षा करते हुए कहा कि ट्रम्प के राष्ट्रपति काल की नीतियों के झटके बरसों तक अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को हिलाते रहेंगे। उन्होंने इसी तरह कहाः "ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के एक दो साल बाद तक तो यूरोप वाले संकोच में रहे और उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या रुख़ अपनाएं लेकिन अब वे ट्रम्प को विश्व व्यवस्था और पश्चिमी दुनिया के लिए एक ख़तरा मान रहे हैं।"
समाचारपत्र वाॅशिंग्टन पोस्ट ने एक साल पहले डोनल्ड ट्रम्प की विदेश नीतियों को पूरी तरह विफल बताया था। संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद के 15 में से 13 सदस्यों की ओर से ईरान पर राष्ट्र संघ के प्रतिबंधों की बहाली के संबंध में अमरीका का विरोध और वह भी एक महीने से कम समय में तीन तीन बार, ऐसी घटना है जिसका राष्ट्र संघ के इतिहास में कोई उदाहरण नहीं है। इस विरोध के स्पष्ट अर्थ व संदेश हैं। इन बातों से पता चलता है कि ट्रम्प अपनी नीतियों को लागू करने में न केवल यह कि सफल नहीं रहे हैं बल्कि ग़लत फ़ैसलों को लागू करने पर आग्रह करके उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अमरीका की साख को भी बट्टा लगा दिया है।
अगर ट्रम्प की नीतियों की सटीक समीक्षा की जाए तो ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता की यह बात पूरी तरह से सही मालूम होती है कि "अब ट्रम्प, ईरान के ख़िलाफ़ दुनिया को अपने साथ नहीं मिला पाएंगे। दुनिया के विभिन्न देशों के संबंध में अमरीका अपना राजनैतिक, आर्थिक व सामरिक नियंत्रण खो चुका है।" अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम बहुत से देशों के लिए अहम हैं और उनके क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव हैं लेकिन ईरान दुनिया के उन गिने-चुने स्वाधीन देशों में से एक है जिनकी आंतरिक व विदेश नीति पर वाइट हाउस में किसी के आने और किसी के जाने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।